दुर्लभ वनस्पतियाॅ : शुभ का शुभारम्भ करने वाली हल्दी अपने साथियों के साथ संकट में !

खत्म होते रीति-रिवाजों के साथ दुर्लभ वनस्पतियों पर विलुप्त होने का संकट !

 New Delhi : हमारे देश मेें आमजन प्रकृति के बहुत करीब रहा है। यूं कहें विश्व की मानवसभ्यता प्रकृति प्रदत्त है तो अतिशयोक्ति न होगा। आयुर्वेद में प्रकृति के संसाधनों का आदरपूर्वक ग्रहण करने का सुझााव दिया गया है। प्राकृतिक पौधों का प्रयोग यहाँ के लोगों द्वारा बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से किया जाता रहा है। इनके पीछे चाहे कोई भी धार्मिक विश्वास क्यों न जुड़ा हो पर कोई वैज्ञानिक तथ्य भी इसमें जरुर छुपा होता है।सम्भव है ये इसलिये गढ़ा गया जिससे यहाँ पर लोगों का इन प्रथाओं पर विश्वास बना रहे और ये अस बहाने स्वास्थ्य लाभ लेते रहें। भारत के प्रत्येक भूभाग पर, विवाह संस्कार को सबसे बड़े संस्कार के रूप में देखा जाता है। इसके द्वारा ही सम्पूर्ण गृहस्थ जीवन की दिशा तय होती है। वैसे तो विवाह संस्कार में कई पौधों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु हल्दी और चावल की भूमिका इन समारोहों में बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। उत्तराखण्ड व अन्य पहाणी राज्यों के क्षेत्रों में हल्दी हाथ प्रथा मैदानी क्षेत्रों में हल्दी रस्म की तरह होती है । इसमे मुख्य आकर्षण इसमें प्रयुक्त किये जाने वाले पौधे हैं। हल्दी हाथ में हल्दी ,मजेठी, सिलफाड़ा, जीराहल्दी, वच तथा सुमया आदि पौधों की जड़ तथा प्रकन्दों को निकाला जाता है तथा ओखली में कूटकर इसका पेस्ट या लेप तैयार किया जाता है। इस लेप में कई वैज्ञानिक गुण हैं !

हल्दी (हरीद्रा)

इसका वानस्पतिक नाम कुरकुमा डोमेस्टिका है। हल्दी भारतीय वनस्पति है यह अदरक की प्रजाति का 5-6 फुट तक बढ़ने वाला पौधा है। इसमें राइजोम या प्रकन्द को हल्दी के रूप में प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद में इसे हरिद्रा, क्रिमिघ्ना, गौरी वरणार्णिनी, योशितप्रिया, हट्टविलासनी, हरदल, कुमकुम आदि के नाम से जाना जाता है। धार्मिक रूप से इसको बहुत ही शुभ माना जाता है।

कैंसर प्रतिरोधक है कुरकुमिन (हल्दी) !

हल्दी का पीला रंग कुरकुमिन के कारण होता है। कुरकुमिन सूजन को कम करने वाला तथा कैंसर प्रतिरोधक है। इसमें पाये जाने वाले टैनिन के कारण इसमें प्रतिजीवाणुक गुण पाये जाते हैं। हल्दी पाचन तंत्र की समस्याओं, गठिया, रक्त प्रवाह की समस्याओं, कैंसर, जीवाणुओं का संक्रमण, उच्च रक्त चाप, कोलेस्ट्रॉल की समस्या एवं शरीर में कोशिकाओं की टूट-फूट की मरम्मत में लाभकारी है। हल्दी पित्त शामक, त्वचा रोग, यकृत रोग, कृमि रोग, भूख न लगना, गर्भाशय रोग, मूत्र रोग में भी अति लाभकारी है।

वच या ब्वाजू


इसका वानस्पतिक नाम एकोसर कैलेमस है। इसे अंग्रेजी में स्वीट लैग, आयुर्वेद में वचा, यूनानी में वच, हिन्दी में वजाई, मराठी में वेखण्ड, गढ़वाली में ब्वाजू, तमिल में वेशम्भू, तेलुगू में वदज, कन्नड़ में वाजे, मलयालम में वयम्बू, संस्कृत में भूतनाशिनी, जटिला हेमवती, आदि नामों से जाना जाता है।वच या ब्वाजू या एकोरस कैलेमस भारत में पाया जाने वाला एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पौधा है। यह भारत में 2000 मीटर तक की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। एकोरस आर्द्र भूमि में पाया जाने वाला एक बहुवर्षीय पौधा है। इसकी सुगन्धित पत्तियों और प्रकन्दों का प्रयोग परम्परागत चिकित्सा में किया जाता है। इसके प्रकन्द का स्वाद मसालेदार होता है जिसके कारण इसे अदरक दालचीनी और जायफल के विकल्प के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। वर्तमान में यह लुप्तप्राय प्रजातियों के रूप में सूचीबद्ध है। यह शराब से होने वाली बीमारियों विशेष रूप से मस्तिष्क और जिगर पर होने वाले प्रभावों के लिये उत्तम औषधि है। आयुर्वेद में इसका उपयोग मतिभ्रम के दुष्प्रभावों को कम करने के लिये किया जाता है। इसकी जड़ों का उपयोग मस्तिष्क व तंत्रिका तंत्र व पाचन विकारों के उपाय के रूप में किया जाता है। बाह्यरूप से वच का इस्तेमाल त्वचा के रोगों, आमवाती दर्द और नसों के दर्द के इलाज के लिये किया जाता है। होम्योपैथिक उपचार हेतु इसकी जड़ों का प्रयोग पेट फूलने, अपच, आहार व पित्ताशय के विकारों के लिये किया जाता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा में इसके प्रकन्दों को वातहर और कृमिनाशक गुण का अधिकारी माना जाता है और इसका उपयोग कई प्रकार के विकारों जैसे मिर्गी और मानसिक रोगों को ठीक करने के लिये होता है। इसका तेल सौन्दर्य प्रसाधन, इत्र उद्योग और कीटनाशकों में भी प्रयोग किया जाता है।

जीरा हल्दी या वन हल्दी या कपूर कचरी !

इसका वैज्ञानिक नाम हेडीचियम स्पाइकेटम है। हेडीचियम स्पाइकैटम जिंजीबेरेसी कुल का पौधा है। यह आमतौर पर स्पाइक्ड जिंजर लिली या कपूर कचरी के नाम से जाना जाता है। जीरा हल्दी को हिन्दी में कपूर कचरी, बंगाली में सटी, कचरी, गुजराती में कपूर कचली, कपूर, कन्नड़ में गोल कचोड़ा, सीना कचोड़ा, कचोड़ा, गंधासाटी, मराठी में गबला कचरी, मलयालम में काटचोलम, कटचूराम, पंजाबी में कचुर कचूर, बनकेला, बन हल्दी, शेदुरी, तमिल में पूलानकिजांगू, किचली किजोंगू, तेलुगू में गंधकचरालू तथा उड़िया में गंधसूठी के नाम से जाना जाता है। यह एक बारहमासी प्रकन्द वाला पौधा पूरे हिमालय क्षेत्र में 3500 से 7500 फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है। यह पौधा 1 मीटर तक लम्बा हो सकता है तथा इसके पत्ते हल्दी के समान होते हैं जो 30 सेमी, तक हो सकते हैं। इस पर सफेद पुष्प पाये जाते हैं। जो स्पाइक पुष्प क्रम में पाये जाते हैं। इसका प्रकन्द या राइजोम 15 से 20 सेमी. लम्बा तथा 2.0 से 2.5 सेमी मोटा पीला भूरे रंग का होता है।
औषधीय गुण !
परम्परागत रूप से इसके प्रकन्द या राइजोम का प्रयोग श्वसन सम्बन्धी अनियमितता जैसे ब्रोनकाइटिस, अस्थमा, जुकाम आदि बुखार, मस्तिष्क को शान्त रखने, सूजन को कम करने, जिवाणुनाशक के रूप में, कवकनाशक के रूप में प्रतिऑक्सीकारक, पीड़ाहारी, डायरिया, पाइल्स, लीवर के रोगों एवं मलेरिया के इलाज आदि के लिये किया जाता है। इसके पाउडर का प्रयोग पेट सम्बन्धी रोगों पेट दर्द बदहजमी तथा कृमिनाशक के रूप में किया जाता है। इसका प्रयोग सौन्दर्य प्रसाधन के रूप में बालों की वृद्धि, त्वचा सम्बन्धी रोगों, इत्र बनाने तथा हर्बल क्रीम बनाने के लिये किया जाता है।

मजीठ या मंजिष्ठा


मजीठ का वैज्ञानिक नाम रुबिया कार्डीफोलिया है। मंजिष्ठा रूबिएसी कुल का सदस्य है। मजीठ को संस्कृत में कामा मेशिका, यजनावली, मंजिष्ठा, गढ़वाली में मजेठी, कन्नड़ में चित्रावलीद, मलयालम में मंचाटी, मंजाटी, तमिल में कीवाली या मंजीती, तेलुगू में तमरावाली या तामावल्ली, कन्नड़ में रक्तमंजिस्टे आदि नामों से जाना जाता है। भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में मजीठ का पौधा बेल के रूप में पाया जाता है इसमें बहुत सारी शाखाएँ होती हैं। इसकी पत्तियाँ हृदयाकार होती हैं। इस पर छोटे-छोटे पीले सफेद पुष्प खिलते हैं जिसकी जड़ें जमीन में दूर-दूर तक फैली रहती हैं। इसकी बेलें अक्सर दूसरे पेड़ों का सहारा लेकर चढ़ जाती हैं। मजीठ के फूलों का रंग सफेद होता है। इसके फल बैंगनी या काले रंग के होते हैं।
औषधीय गुण !
मजीठी पर छोटे-छोटे बाल जैसी संरचनाएँ पाई जाती हैं जिसके कारण ये कपड़ों या अन्य मुलायम वस्तुओं पर चिपकती हैं। केवल इसकी जड़ का प्रयोग औषधीय प्रयोग के लिये किया जाता है। इसका रस मीठा, तीखा और कसैला होता है। इसकी तासीर गर्म होती है। इसके कई चिकित्सकीय उपयोग होते हैं। मिस्र के लोग मजीठ का प्रयोग होंठ को लाल करने में करते थे। यह रक्त तथा त्वचा आधारित कई बीमारियों को दूर करने के काम आता है।मंजेठी ऐसी औषधि है जो रक्त को साफ करने के साथ ही शरीर से पित्त दोष अग्नि तत्व को सन्तुलित करने का कार्य करती है यह कील या पिम्पल को दूर करती है। मंजिष्ठा का प्रयोग कई रोगों में किया जाता है, जैसे- स्किन एलर्जी, पेचिस, उच्च रक्त चाप, मूत्र संक्रमण आदि। मंजिष्ठा मस्तिष्क तथा पूरे तंत्रिका तंत्र को शान्त करता है।
जटामासी
इसका वैज्ञानिक नाम वेलिरियाना जटामांसी है। सुमया वेलेरिनेसी कुल का पौधा है। इसे हिन्दी में जटामांसी, बंगाली में मुश्कबाला, तगर, सुमेयो, आसारन, नाहानी, गढ़वाल में सुमया, गुजराती में तगरगन्तौड़ा, कान, मुश्कबाला, कन्नड़ में मुश्कबाला, कश्मीरी में मुश्कबाला, चलगुड़ी, मराठी में तगारगानथोड़ा, तगरमूल, पंजाबी में बालमुश्कबाला, मुश्कवाली, तेलुगू में जटामासी, तथा उर्दू में रिशवाला के नाम से जाना जाता है। सुमया उत्तर पश्चिम हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक संकटग्रस्त औषधीय पौधा है। जटामांसी एक बारहमासी शाकीय द्विलिंगी पौधा है इसकी अधिकतम लम्बाई 10.5 सेमी से 22.3 सेमी. तक होती है। जटामांसी में पत्तियाँ तथा जड़ें सीधे ही राइजोम से निकलती हैं तथा जड़ों की लम्बाई 6-10 सेमी तक होती है। राइजोम पौधे का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है जिसके मुख्य रासायनिक पदार्थ जैसे- सिस्कीटर्पीनॉइड्स, वेलेनॉइड्स तथा जटामैनीनस हैं।

औषधीय गुण !
इस पौधे का पुष्पण काल जनवरी से अप्रैल तक होता है। जटामांसी पौधे का प्रयोग कोढ़, मिर्गी, मूर्च्छा, तंत्रिका रोग, सर्पदंश, बिच्छू दंश, हैजा आदि रोगों के इलाज के लिये किया जाता है। इसका प्रयोग कोशिकीय टॉनिक तथा कैंसर के उपचार के लिये भी किया जाता है। सुमया का प्रयोग शान्तिदायक, उपशामक के रूप में, रोगाणुरोधक, बलगम निकालने वाली, ज्वरनाशक, तंत्रिका टॉनिक, नेत्र सम्बन्धी रोगों के लिये, अग्निवर्धक, पेट साफ करने वाली, मिर्गी हैजा, सर्पदंश, अस्थमा, जलने, रक्त सम्बन्धी रोगों, त्वचा रोगों, अल्सर आदि में किया जाता है।

कमल्या या पाषाणभेदा !
इसका वैज्ञानिक नाम बर्जीनिआ सीलिएटा है। कमल्या या पाषाणभेदा सैक्सिफ्रैगेसी कुल का पौधा है। इसको संस्कृत में सिलफाड़ा, अश्वभेदा, आसानी में पत्थरकुची बंगाली में पतराकुंर, हिमसागर, अंग्रेजी में विन्टर बिगोनिया हिन्दी में सिलफाड़ा, पत्थरचट्टा, सिलफेड़ा, गढ़वाली में कमल्या, कोदिया, कन्नड़ में पाषाणभेदी, हितागा, पाषानबेरु, कश्मीरी में पाषाणभेद, मलयालम में कालूवची, कालुखानी तथा तेलुगू में कोन्डापिन्डी आदि नामों से जाना जाता है।पाषाणभेदा एक बारहमासी पौधा है जो नमी एवं छायादार स्थानों पर पाया जाता है। यह पौधा पूरे मध्य भारत तथा हिमालय क्षेत्र में 4000-12000 फिट पर पाया जाता है इसकी लम्बाई 12 से 15 इंच तक होती है। इस पर पुष्प फरवरी से अप्रैल तक तथा फल मार्च से जुलाई में आते हैं तथा इसके पुष्पों का रंग गुलाबी होेता है। इसमें राइजोेम या प्रकन्द पाया जाता है। इसके प्रकन्द गोल ठोस तथा 1.5 सेमी लम्बे तथा 1.2 सेमी. मोटे भूरे रंग के होते हैं इसकी गोल पत्तियों पर छोटे-छोटे रोम पाये जाते हैं।

औषधीय गुण

इसमें कई औषधीय गुण पाये जाते हैं जैसे टॉनिक जीवाणुनाशक, कैंसर प्रतिरोधक, मधुमेह प्रतिरोधी, सूजन को कम करने वाले आदि। लेकिन इसका प्रयोग मुख्यतः वृक्क रोगों जैसे किडनी स्टोन को नष्ट करने में किया जाता है। इसके रस को कान के दर्द में प्रयोग किया जाता है तथा इसके टॉनिक का प्रयोग बुखार में किया जाता है। इसका एक महत्त्वपूर्ण उपयोग त्वचा रोगों में कटने जलने, एलर्जी आदि में किया जाता है। इसमें कवकनाशी गुण भी पाये जाते हैं जिसके कारण यह त्वचा की कवक से सुरक्षा करता है।
रीति -रिवाजों के साथ बनस्पतियों पर भी संकट !
रीति-रिवाजों में शामिल कर जिन बनस्पतियों को संरक्षित करने का नायाब तरीका बुजुर्गो ने ईजाद किया था वह आज संकट में है। उपरोक्त वर्णित सभी बनस्पति जातियाँ संकटग्रस्त हैं। ये सभी पौधे कुछ क्षेत्रों में सिमट कर रह गए हैं। गाजर घास, काली बांसिग, लैन्टाना आदि विदेशी घासों के द्वारा इनके आवास पर अतिक्रमण किया जा रहा है। परम्परागत ज्ञान नई पीढ़ी तक नहीं पहुँच पा रहा है जिसे इन बहुमूल्य जातियों का संरक्षण नहीं हो पा रहा है।

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