पानी बिन सब सून हो रहा , अब जीवन पर भी संकट है

  झीलों के शहर की दुर्दशा: अतिरिक्त भूजल दोहन  क्षेत्र बना भोपाल

jal sankatBhopal: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को झीलों का शहर कहा जाता है। वर्षों से यहाँ के तालाब नगरवासियों के लिए पेयजल का प्रमुख स्रोत रहे हैं लेकिन पिछले एक दशक से देश के अन्य शहरों की तरह भोपाल भी गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। तेजी से गिरते भूजल स्तर वाले शहर भोपाल को केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने अतिरिक्त भूजल दोहन के क्षेत्र में शामिल किया है। पेयजल का प्रमुख स्रोत रहा बड़ा तालाब दिनोंदिन अपने प्राकृतिक स्वरूप को खोता जा रहा है। 45 वर्गकि.मी. क्षेत्रफल से घटकर अब 31 वर्गकि.मी. ही रह गया है। शहर के कोलार क्षेत्र में पूरे साल ही पानी की किल्लत रहती है। लोगों को निजी टैंकर संचालकों से मंहगा पानी खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है । एक टैंकर के 250 से 500 रुपए तक वसूले जाते हैं।

                                                 जल स्तर का हाल

tankar mafiyaअगर पूरे मध्यप्रदेश की बात की जाये तो एक तिहाई आबादी को रोज पानी नहीं मिल पा रहा है। खुद प्रशासन का मानना है कि प्रदेश के 360 नगर निकायों में से 189 में प्रतिदिन पानी सप्लाई नहीं हो पा रही है । ग्रामीण क्षेत्रों की हालत तो और बदतर है। मध्यप्रदेश सरकार के प्रदेशव्यापी जलाभिषेक अभियान के तहत सभी 50 जिलों की लगभग 130 ऐसी नदियों और नालों को चिन्हांकित किया गया है जो अब सूख चुकी हैं।

bhopal jal bhopalइंदौर-मालव, जबलपुर और ग्वालियर और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों की स्थिति दिनों दिन भयावह होती जा रही है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के एक सर्वेक्षण में यह खुलासा हुआ है कि बीते एक साल में मालवा-निमाड़ अंचल में भूमिगत जल स्तर में औसत 0.18 से 10 फीट तक की गिरावट दर्ज की हुई है,सबसे बुरी हालत इंदौर, धार, बडवानी, झाबुआ, देवास, मंदसौर और रतलाम की है। 30 मार्च 14 तक इंदौर में औसत जल स्तर 29.50 फीट था, जो अब 38.35 तक नीचे उतर गया है. इसी तरह धार में 26.20 से बढ़कर 30.27, बडवानी 28.03 से बढ़कर 28.95, झाबुआ में 22.33 से 26.40, देवास में 33 से 38, मंदसौर में 33. 50 से 35 तथा रतलाम में औसत जल स्तर 33 से 43 फीट तक नीचे उतर गया है।

                 सरकार की हताशा!

bhopaशायद राज्य सरकार के पास इस संकट से उबरने के लिए कोई ठोस और टिकाऊ योजना नहीं है । इसलिये उसे इसका उपाय निजीकरण में नजर आ रहा है, इसी सोच के अनुरूप प्रदेश के खंडवा शहर की जल प्रबंधन व्यवस्था को निजी कंपनी को सौंपने की कोशिश की गयी थी। मामला उच्च न्यायालय तक पहुच गया।  जलसंकट और पर्यावरण का गहरा सम्बन्ध है, लेकिन प्रदेश सरकार को शायद इसकी कोई चिंता नहीं है । एक बानगी हाल ही में मध्यप्रदेश विधानसभा परिसर में सदन के सदस्यों के लिए नए विश्राम घर बनाए के लिए 1600 पेड़ों की कटाई के फैसले में देखने को मिलता है। भोपाल खुशनुमा और हरियाली मौसम के लिये मशहूर रहा है लेकिन अब यह बीते कल की बात हो चुकी है। भोपाल की पुरानी तासीर खत्म हो चुकी है।

निजीकरण नही पर्यावरण की ओर लैटो साहेब !

bhopal Lake_view_road-जल संकट से उबरने के उपाय पानी के निजीकरण और पेड़ों को विकास का अवरोध मानने में नहीं है; बल्कि जरूरत इस बात की है कि वाटर हार्वेस्टिंग पद्धिति के द्वारा बारिश के पानी को जमीन के अंदर पहुँचाया जाए जल युद्ध स्तर पर नदियों, झीलों और कुँओं व बावड़ियों को पुर्नजीवित करने का काम किया जाए। लोगों और सरकारों की सोच में बदलाव आये । जिससे वे पेड़ों और हरियाली को अवरोध नहीं साथी माने । प्रदेश का प्रशासन तो इस समस्या को लेकर कितना गंभीर है उसका अंदाजा टीकमगढ़ जिले के एसडीएम के हालिया बयान से लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा कि ग्रामीणों को जलसंकट से बचने के लिए तीन-तीन शादियां करनी चाहिए, एक पत्नी बच्चों को जन्म देने के लिए और बाकी दो पत्नियां पानी लाने के काम आएंगे।

जावेद अनीस

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