बीते साल का खबरिया चश्मा- लैंगिक लड़ाई से जुड़े अहम फैसले

New Delhi  :  (Neetu Routela)  बचपन से साल के अंत में 31 दिसंबर को आने वाली साल की मुख्य खबरे मेरा सबसे पसंदीदा कार्यकर्म रहा है छोटे से समय में देश-दुनिया का साल भर का लेखा-जोखा आँखों के सामने तैर जाता है । कुछ से आपका कोई जुड़ाव है और कुछ से जानकारी का रिश्ता। आज ऐसे ही खुद से बात करते करते लगा साल भर में कुछ ऐसे फैसले खबरे आयी जो भारत में संघर्षरत सामाजिक क्षेत्र के लिए काफी महत्वपूर्ण रही। जिसे शायद ही मुख्य खबरों में वो तवज्जो, पक्ष और आवाज़ मिले जिसकी जरूरत है सो सोचा क्यों ना लिखा-बांटा जाये अपना सालभर की मुख्य खबरों का देखा सुना खबरनामा – जिस पर आगे भी चर्चा, काम चलता रहेगा ताकि न्यायपूर्ण समाज की स्थापना हो सके! छोटी सी कोशिश कुछ खबरों के साथ क्यूंकि सबकुछ यहाँ उतार पाना संभव नहीं है सो अग्रिम क्षमा बहुत कुछ महत्पूर्ण छूट जाने के लिए! आशा है मेरी छोटी सी कोशिश और मकसद कुछ सोच और संघर्ष को मजबूती देंगे ।

हदिया के चुनाव के अधिकार को मानते हुए कोर्ट द्वारा उसे अपने पति के साथ रहने की इजाजत (जनवरी’18)

साल की शुरुवात में ये फैसला आया जिसमे हदिया नाम की लड़की जो मूल रूप से हिन्दू थी और जिसने अपनी इच्छा से इस्लाम कुबूल करते हुए धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम लड़के से शादी की थी। इस चुनाव को चुनाव ना मानते हुए लव-जिहाद से जोड़ा गया और इस निकाह हो ख़ारिज करने की अपील की गयी। लम्बे संघर्ष के बाद ये माना गया की एक बालिग़ लड़की को पूरा संवैधानिक हक़ है की वो अपना जीवन साथी चुन सके! महिला के राइट टू चॉइस की ये गूंज साल की अच्छी शुरुवात रहा।

फारूखी को बलात्कार केस से बरी किया गया (जनवरी’18)

पीपली लाइव के निर्देशक को बरी करने के कई आधारों में से एक था “आपसी सहमति का आधार“ जिसने बड़े जंतोजहद के बाद 2013 के बलात्कार कानून में आयी सहमति को इतना सहमा दिया की उसका अस्तित्व हे खतरे में पढ़ गया ज्यादा जानने के लिया आप पढ़ सकते हैं।

तीन तलाक़ पर बैन/प्रतिबंध (जनवरी’18)

जिसे सीधे तौर पर ऐसे दिखाया गया जैसे मुस्लिम महिला समुदाय के तीन तलाक़ से पैदा होने वाली हिंसा, असुरक्षा का समाधान हो। क्यूंकि ये सच बात है तीन तलाक़ मुस्लिम महिला के सिर पर लटकती ऐसी तलवार हो जो गाहे बगाहे उसके सिर पर कभी भी गिर सकती है और इससे निजात एक बड़ी राहत होगी। पर साल के अंत तक जारी बहस और राज्य सभा में हाल ही में प्रस्तुतिकरण और पास होने तक गहन और खुली चर्चा में कई बातों और समुदाय की आवाज को अनदेखा किया गया। सोचा जाना चाहिए की तीन तलाक़ वैसे हे गैर इस्लामिक और असंवैधानिक प्रक्रिया है तो इसे बेन करने की बजाय जागरूकता लाना ज्यादा जरुरी है की ये ख़ारिज और गैर महत्वपूर्ण अभ्यास है। शादी करना और शादी को तोडना क़ानूनी नहीं बल्कि व्यक्तिगत मामला है तो इसे आपराधिक श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है? संक्षेप में ऐसे सज़ा के प्रावधान महिला को आगे आकर बोलने से और पीछे ले जायेंगे। जहा वो खुद तो जंतोजहद में रहेगी एक तरफ उन्हें सामाजिक और पारिवारिक निंदा का डर बना रहेगा। दूसरी  तरफ कड़े प्रावधान होने पर न्याय और मुश्किल हो जाता है। इसका ज्यादा दबाब पीड़ित पर  आ जाता है की उसका न्याय किसी के साथ अति तो नहीं हो गया और उसके सहने की सीमा को बढ़ावा देता है। जहा तक असुरक्षा की बात है इसमें महिला के सामाजिक और आर्थिक अधिकार कैसे सुरक्षित होंगे पर कोई विचार ही नहीं किया गया है। सबसे बड़ी बात अगर पति को जेल होने की स्थिति में पत्नी के घर या पति के साथ रहने के अधिकार के क्या मायने रह जायेंगे? जो की तलाक़ के विरोध का सबसे बड़ा कारण है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्टाकिंग बलात्कार यौन हिंसा को जेंडर न्यूट्रल बनाने की अपील ख़ारिज की’ (फरवरी’18)

महिलाओं के साथ होने वाले इस तरह अपराध जो पुरुषों द्वारा ही किये जाते है और संसाधनों और पहुँच वाले पुरुष यदि इस कानून के तहत संरक्षण पाएंगे तो क्सि खामियाजा भी महिलाओं को ही भुगतना पड़ेगा।

2005 से पहले की याचिकाओं को भी पैतृक सम्पति में अधिकार – सुप्रीम कोर्ट (फरवरी’18)

सराहनीय पहल, महिलाओ के सम्पति के अधिकार पर महिला आंदोलन हमेशा से ही आवाज उठाता रहा है। यही एक हक़ है जो बेटिओ को बचपन से पराया धन जैसे सोच और शादी के बाद पति द्धारा अपने घर से निकाले जाने वाली हिंसा और धमकी से निजात दिला सकता है।

दिल्ली असेम्ब्ली ने नाबालिग के बलात्कारी को फांसी की सजा का संकल्प पारित किया  (मार्च’18)

जो आगे चलकर अप्रेल माह में एक कानून बन चूका था जिसका दूरगामी बुरा असर उस नाबालिग पर ही पढ़ेगा जो न केवल उसके न्याय मांगने के रास्ते कम करता है बल्कि उसके जीने और पुनर्वास की सम्भावना को भी कुचल देता है।

मातृत्व अवकाश 12 से 26 हफ्ते बढ़ाया गया (जुलाई ’18)

एक तरफ महिला कामगारों के लिए ये एक तोहफा है पर दूसरी तरफ इसमें कई बातों की अनदेखी की गयी है। जैसे इसमें पारिवारिक अवकाश जिसमें पिता को भी छुट्टी लेने की बात होती ताकि ये पुख्ता किया जा सकता की बच्चो की देखभाल दोनों का काम है, महिलाये ज्यादातर असंगठित क्षेत्र में काम करती है जिसमें इस तरह के प्रावधान कागजों तक में नहीं होते, काम की जगह पर अन्य सुविधायें जैसे पालना घर आदि पर ज्यादा जोर देना ज्यादा प्रभावकारी होता जिसमें महिलाओं के काम मिलने के मौके खतरे में नहीं होते।

बोहरा मुस्लिम महिलाओं में खतने की प्रथा मुलभुत अधिकारों के खिलाफ-

      सुप्रीम कोर्ट (जुलाई ’18)

मुस्लिम महिलाओं की यौनिकता तो काबू में रखने के लिए जो खतने की पितृसत्तामक जानलेवा परम्परा अब तक चली आ रही थी पर रोक एक सराहनीय कदम रहा।

बिहार के मुज्जफरपुर के बालिका गृह में हुआ भयानक यौन शोषण (जुलाई ’18)

दर्द और खौफ की इस अंतहीन दास्तान का खुले तौर पर जो असर हुआ वो ये की सरकारी मशीनरी जागी और ऐसे कई आश्रय ग्रहो की फौरी जांच की गयी जिसके नतीजे बड़े शर्मनाक निकले। आने वाले समय में गहन जांच और परिणामों के आधार पर निति और व्यावहारिक फैसले लिए जाने का उतावलापन दिखता है। पर ये उतावलापन सामयिक और खानापूर्ति ना हो ये चिंता के साथ जूझते रहने का विषय भी है।

मोब लिंचिंग/ भीड़ हत्या पर रोक लगाने को सरकार ने बनायीं सिमिति (जुलाई ’18)

भीड़ दवारा किसी को भी इल्जाम लगा कर मार देने की बढ़ती घटनाओं के चलते ये खबर काफी महत्वपूर्ण है जो एक तरफ इस बात को स्वीकारती है की ऐसा हो रहा है, दूसरे ये गैर क़ानूनी है और इस तरह भीड़ के पीछे छुपे अपराध भी अपराध ही है। छोटी सी उम्मीद जिस पर आपातकालीन स्तर पर सख्ती से काम होना चाहिए।

शादी में दोनों को शारीरिक संबंध बनाने से ना कहने का हक़ – हाई कोर्ट (जुलाई ’18)

जो सीधे तौर पर जहा महिला के राइट टू चॉइस और यौनकता के अधिकार को सुनिश्चित करता है और खास तौर पर मैरिटल रेप मतलब विवाह में होने वाले बलात्कार का निषेध करता है जिसे अब तक कानून या समाज में चर्चा तक के लिए जगह नहीं दी जा रही थी। बीते महीने कलकत्ता में पहले बार एक पुरुष को पत्नी द्वारा जबरदस्ती सम्बन्ध बनाने के कारण मैरिटल रेप में गिरफ्तार भी किया गया।

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश को अनुमति सुप्रीम कोर्ट (जुलाई ’18)

बरसो पुरानी दक्यानुसी सोच को कोर्ट का इंकार पर वास्तविक रूप से इस हक़ को पाने की जंतोजहद ज़ारी ।

सेनेटरी नैपकिन से जी एस टी हटी (जुलाई ’18)

लम्बे विरोध के बाद ये संभव तो हुआ पर क्या वास्तविक से माहवारी से जुडी समस्याओं का हल हुआ? जानने के लिए पढ़े क्या सेनेटरी पैड का टैक्स फ्री होना काफ़ी है?

व्याभिचार धारा 497 में महिला को सजा नहीं- सुप्रीम कोर्ट (अगस्त’18)

हम सब जानते है यदि पुरुष को ये हक़ भी मिल गया तो उसे कितना कम समय लगेगा दिन रात शक करके प्रताड़ित करने के साथ-साथ, इस आधार पर महिला को छोड़ देने में।

धारा 377 समाप्त – सुप्रीम कोर्ट (सितंबर’18)

ऐतिहासिक फैसला जिसने एल जी बी टी समुदाय को बड़ी राहत दी! और नींव रखी एक समावेशी समाज की, जिसमें उसके साथी चुनने के व्यक्तिगत और संविधानिक अधिकार को सुनिश्चित किया।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 498 (दहेज़ कानून)  में दिया पूर्व फैसला रद्द (सितम्बर’’18)

पिछले साल पहले दिए फैसले जिसमें महिलाओं को दहेज़ कानून के तहत मिलने वाली राहत जैसे तुरंत गिरफ्तारी आदि को रोक कर वेलफेयर समिति जैसे गैर व्यावहारिक सुझावों की और धकेला गया था! दहेज़ हिंसा का सीधा अर्थ दहेज़ हत्या है और ऐसे में ये लम्बे लटकने वाले सुझाव महिला के जीवन को और खतरे में डालने वाले भर थे! इस खबर से जहा एक और राहत वापस मिली वही संघर्ष को आगे बढ़ाने का संबल भी।

मीटू अभियान (अक्टूबर’18)

वैश्विक स्तर पर चलने इस अभियान की गूंज  भारत में भी खासी रही जो शुरू तो मनोरंजन क्षेत्र से हुई, पर जिसकी गूंज हर महिला कामगार की आपबीती में सुनाई दी। कई अर्थो में ये अभियान महत्वपूर्ण रहा जिसने न केवल सालो से घुटती सिसकियों को स्वर दिया बलिक सरकारी मशीनरी को भी जी ओ एम समिति का गठन करने पर विविश किया! 26 साल पहले भंवरी देवी ने जिस बुलंदी से अपने पर होने वाली कार्यस्थल हिंसा को उठाया था आज देश के कोने कोने से ऐसे विरोध के स्वर इस अभियान के कारण सुनाई दे रहे है! आशा है इसका कोई जमीनी स्तर पर भी कोई दूरगामी परिणाम निकले और महिलाओं को एक स्वस्थ हिंसा और भेदभव से रहित कार्यस्थल मिलेगा जहा वो अपने आप को आसानी से साबित कर सकेंगी।

लोक सभा ने 27 बदलावों के साथ ट्रांसजेंडर बिल पारित किया (दिसंबर’18)

इस बिल को अभी राज्य सभा में रखा जाना है पर इसका काफी विरोध हो रहा  है। इस बिल में एक तरफ समुदाय द्वारा दिए गए सुझावों को अनदेखा किया गया है वही ट्रांसजेंडर शब्द को बड़े ही सिमित और नकारत्मक रूप में परिभाषित किया गया है! सबसे बड़ी खामी ये की एक ट्रांसजेंडर स्वयं को कैसे परिभाषित करे ये एजेंसी उससे छीन ली गयी है जो नालसा जजमेंट की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

सेरोगेसी बिल लोक सभा में पारित (दिसंबर’18)

किराये की कोख से संबधित कानून को पास किया गया जिसमे सीधे तौर पर ये दावा किया गया की इस व्यवसाय में जो महिलाएं कार्यरत है उनका शोषण रुकेगा पर ये बिल भी अपने आप में विवादस्पद है। परिवार और शादी का महिमामंडन इसके केंद्र में है और इसके बाहर जो लोग है उनकी पूरी अनदेखी की गयी है।

सिंगल पैरंट पुरुषों को भी मिल सकती है 730 दिन की चाइल्ड केयर लीव (दिसम्बर’18)

पुरुष को बच्चे की देखभाल की भूमिका में देखना और स्वीकार करना और गैर शादीशुदा पुरुषो का जो जिक्र, सराहनीय सोच है! शायद बड़े स्तर पर दोनों साथी बराबरी से इस जिम्मेदारी को निभाये वाली सोच और शादी से परे परिवार की सोच को आगे ले जाये पर ये दरियादिली केवल सरकारी मुलाजिमों(विभागीय) तक सिमिति है।  पर सोचने की बात ये है की  क्या सच में हम जिस पितृसत्तात्मक समाज में रहते है, जहां पति की मृत्यु के बाद स्त्री को यही समझाने और मानने की पुरजोर कोशिश की जाती है की “इस घर का नाम बनाये रखे, अब इस घर की इज्जत तुम्हारे हाथ है आदि आदि ताकि वो फिर शादी के ख्याल तक से परहेज रखे! और पुरुष को ऐसी ही स्थिति में ये की “ अकेले ज़िन्दगी नहीं कटेगी, घर में दिया जलाने वाला या सबसे खरतनाक तर्क 2 रोटी बनाने के लिए भी तो कोई चाहिए“ ताकि वो तुरंत शादी को तैयार हो जाये! वैसे मेरे लिए इस तर्क का मतलब यही है की समाज भी ये मानता है स्त्री सक्षम है ’अकेले जीने में’ बस इस शक्ति और सामर्थय को मर्यादा नाम तले दबा दिया जाता है खैर ऐसे में बच्चे वाले, वो भी सरकारी कर्मचारी एकल ’अकेले जीने में सक्षम’ पुरुष होने की कितनी सम्भावना है??

जैसा मैंने पहले भी कहा काफी अन्य मुद्दे जैसे एस सी एस टी बिल, एंटी ट्रैफिकिंग बिल, सैनिटेशन (गटर साफे करने वाले) कामगारों के दर्दनाक मौतें आदि जैसे काफी महत्वपूर्ण खबरे और चर्चा छाई रही पर शब्द सीमा के कारण सब यहाँ शामिल नहीं कर पा रही हूँ। पर इसका ये मतलब कतई नहीं की वो खास नहीं है खैर इन झलकियों के लेखे-जोखे के साथ संघर्षो और संघर्षों से उपजी उम्मीदों को साल के अंत में सलाम करते हुए बस इतना की उम्मीद के साथ, संघर्ष के लिए तैयार होकर हम फिर जुटेंगे मुमकिन की ओर गुनगुनाते हुये “वो दिन के जिस का वादा था हम देखेंगे, मुमकिन है के हम भी देखेंगे, लाज़िम है  के हम भी देखेंगे…. हम देखेंगे !

Neetu Routela

                                                                                                                                                                                  Vaidambh Media