भारत से गेहूं निर्यात चार सालों के निम्नतम स्तर पर !

लगातार कम होते जा रहे भारतीय गेहूं के खरीदार !
Mumbai : भारत दुनिया के गेहूं बाजार के मुकाबले में लगातार पिछड़ता जा रहा है।Harvesting-wheat-crop-in-a-village ऊंची कीमत और पिछले साल मिट्टïी में नमी कम होने से खाद्यान्नों की गुणवत्ता खराब होने की वजह से भारतीय गेहूं के खरीदार लगातार कम होते जा रहे हैं।wheat expo 72 करोड़ टन के वैश्विक गेहूं उत्पादन में से प्रमुख उत्पादक देश अन्य देशों को 15 करोड़ टन का निर्यात करते हैं। सरकारी स्वामित्व वाली कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़े दर्शाते हैं कि अप्रैल-दिसंबर 2015 में भारत से गेहूं निर्यात में 82 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई और यह मात्र 5.5 लाख टन रह गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि के दौरान यह 27.5 लाख टन था। जनवरी-मार्च 2016 के बीच भी यही रुझान जारी रहने की संभावना देखते हुए अनुमान है कि भारत से गेहूं निर्यात चार सालों के निम्नतम स्तर पर पहुंच जाएगा।
 गेहूं की प्रचुर आपूर्ति की वजह से हालात बिगडऩे की संभावना !
भारत के गेहूं निर्यात में आने वाली यह तेज गिरावट इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पिछले साल देश में रिकॉर्ड उत्पादन की वजह से अत्यधिक आपूर्ति देखी गई। Wheat_P1इस साल उत्पादन में गिरावट के अनुमान के बावजूद अत्यधिक आपूर्ति की स्थिति बरकरार रहने की संभावना है जिसकी वजह से घरेलू गोदामों में भंडारण की समस्या पैदा हो सकती है। चूंकि इसके निर्यात में लगातार मंदी बनी हुई है, इसलिए इस साल भारत में गेहूं की प्रचुर आपूर्ति की वजह से हालात बिगडऩे की संभावना है।
वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय निर्यातकों के महासंघ (फियो) के महानिदेशक और मुख्य कार्याधिकारी अजय सहाय ने कहा, ‘विश्व के गेहूं बाजार से भारत के बाहर जाने के पीछे दो कारण हैं। वैश्विक स्तर पर गेहूं की कीमतें 25 प्रतिशत तक कम हुई हैं। साथ ही काले सागर और यूरोप जैसे भारत के प्रमुख प्रतिस्पर्धियों की मुद्रा का अवमूल्यन हुआ है। इसलिए भारत की तुलना में वे ज्यादा फायदेमंद स्थिति में हैं।’ New Pictureदरअसल अप्रैल-दिसंबर 2015 के दौरान डॉलर के मुकाबले यूरो में 15 प्रतिशत अवमूल्यन हुआ है। इस वजह से यूरोपीय देशों को अपने निर्यात बढ़ाने में बड़ा फायदा मिला है। इसके अलावा सरकार ने सरकारी भंडार से गेहूं निर्यात को मंजूरी नहीं दी और सिर्फ ‘पूर्व भंडार स्तर’ पर ही इसका निर्यात स्वीकृत किया। सहाय ने कहा, ‘घरेलू बाजार में चल रही गेहूं की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों से ज्यादा हैं जिसने भारत के निर्यात को मुश्किल कर दिया है। जब तक गेहूं निर्यात को सब्सिडी के रूप में प्रोत्साहन नहीं दिया जाता, जैसा कि अब तक नहीं हुआ है, इसका निर्यात मुश्किल रहेगा।’
 गेहूं निर्यात में गिरावट का प्रमुख कारण खराब गुणवत्ता !
वित्त वर्ष 2012-13 में भारत ने 193.424 करोड़ डॉलर मूल्य का 65.1 लाख टन गेहूं निर्यात करके एक कीर्तिमान स्थापित किया था।

wheat govt
WHEAT on govt. Bayer house in Jaipur

उस समय भारत द्वारा आंकी जा रही कीमतें वैश्विक बाजार में चल रहीं कीमतों से काफी नीचे थीं। एपीडा के एक वरिष्ठï अधिकारी ने कहा, ‘आज वैश्विक बाजार में हमारी कीमतें पूरी तरह से अलग हैं। जब तक हमारे दाम नीचे नहीं आते या दुनिया के दाम ऊपर नहीं चढ़ते, तब तक भारत से गेहूं निर्यात में इजाफा नहीं होगा।’ ब्लूमबर्ग द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत के 242.91 डॉलर प्रति टन के मुकाबले अमेरिका में गेहूं की कीमतें 183.17 डॉलर प्रति टन हैं। अर्जेंटीना में भी गेहूं के दाम 200 डॉलर प्रति टन के आसपास हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की एक हालिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नवंबर 2014 में गेहूं की कीमतें 280 डॉलर प्रति टन के स्तर से कम रहीं। अमृतसर की पूजा ट्रेडिंग कॉरपोरेशन के मालिक एवं गेहूं निर्यातक विमल सेठी ने इस साल गेहूं निर्यात में गिरावट का प्रमुख कारण खराब गुणवत्ता को ठहराया है। (B.S.)

दिलीप कुमार झा