मानव स्वास्थ्य का रक्षक ‘यारसागुम्बा’ संकट में , विलुप्त होने का खतरा

yarsagumbaDehradun: यारसागुम्बा उत्तराखण्ड के पिथौरागढ, टिहरी सहित चमोली जिले के उंचे हिमालयी क्षेत्र में पाया जाने वाला एक पत्तियों रहित पौधा है, जिसे स्थानीय भाषा में कीडा जडी और हिमालयी हर्बल व्याग्रा के नाम से भी जाना जाता है।यारसागुम्बा समुद्र तल से 3000 से 5000 मीटर हिमालय क्षेत्र के मखमली बुग्याल में मई और जून माह में उत्तराखण्ड समेत नेपाल और भूटान में पैदा होता है। 2 से 6 सेन्टीमीटर लम्बा यह कीडे के आकार का विना पत्तियों वाला पौधा एक अनोखे तितली या पतंगे के डिम्भ से जमीन के अन्दर से उगता है।

अन्तराण्ट्रीय बाजार में एक ग्राम यारसागुम्बा की कीमत 100 डालर

yarsa-gumba  उत्तराखण्ड से तस्करी के जरीये बडे पैमाने पर यारसागुम्बा नेपाल और चीन तक पहुँचायी जाती है, अन्तराण्ट्रीय बाजार में एक ग्राम यारसागुम्बा की कीमत 100 डालर है। इसी लिये इसे वानस्पतिक सोना भी कहा जाता है। चीन में पिछ्ले 2000 वर्षो से परम्परागत दवा “कैटरपिलर फंगस टाँनिक” को उंचे मुल्य पर शरीर की उर्जा व स्फूर्तिवान बनाने को, किडनी व फेफडे की मजबूती, अस्थमा, केन्सर व हर्बल वियाग्रा के रुप में बनाकर बेचा जाता है। आज उत्तराखण्ड से हजारो किलोग्राम यारसागुम्बा सस्ते मूल्यों पर नेपाल के रास्ते चीन तक पहुँचती है, परन्तु सरकार की किसी भी तरह की विदोहन नीति न होने के कारण हिमालयी क्षेत्रों मे रहने वाले लोग सीजन में अपने साथ टेंन्ट, कम्बल, खाने पीने का सामान, प्लास्टिक की थैलियां लेकर इन बुग्यालों में बडे पैमाने में पहुँचकर यारसागम्बू का अवैध व अवैज्ञानिक तरीके से विदोहन कर रहे है, जिस के कारण यारसा गम्बू की संख्या भी दिनो दिन घटती जा रही है व विलुप्ति के कगार पर है, साथ ही हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण प्रदूषण  भी बढता जा रहा है व इन क्षेत्र में रहने वाले जीव जन्तुओ पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड रहा है।

नेपाल सरकार ने यारसागुम्बा उद्योग के टैक्स से प्राप्त किये  5,1 मिलियन रुपये 

yarsagmbooस्थानीय लोगो को इसे खोजने के लिये बहुत मेहनत करनी पडती है, आक्सीजन यहां पर बहुत कम रहता है, ठंड बहुत रहती है, टेन्ट में लोग रात गुजारते है विकट परिस्थितियाँ रहती है, खडी चट्टानो को पार करना होता है। फिर भी यारसागुम्बा इन क्षेत्रो मे रहने वाले 90 प्रतिशत स्थानीय लोगो का खेती के बाद दूसरा सबसे बडा स्रोत बन गया है, यारसागुम्बा गरीब लोगो का केस आर्थिकी का स्रोत है, जिससे वे अपने बच्चों की स्कूल फीस भरते है, खाद्य सामाग्री खरीददे है और ॠण की भरपाई करते है। यारसागुम्बा की सही विदोहन नीति के कारण बायोलोजिकल कन्जर्वेशन में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताविक पिछ्ले साल नेपाल सरकार ने लगभग 5,1 मिलियन नेपाली रुपये यारसागम्बू उद्योग के टैक्स से प्राप्त किये। क्या उत्तराखण्ड सरकार इस तरह की सही नीति बना पायेगी जिसके कारण सरकार सहित इन हिमालयी क्षेत्र मे रहने वाले लोगो का भला हो पायेगा।

देवेन्द्र सिंह रावत

जोशीमठ