ये कैसा सुधार : 1% से भी कम को इस व्यवस्था में मिल रहा न्याय !

 अंग्रेजों द्वारा खड़ी की गई भारतीय न्याय व्यवस्था आज भी मौजूद !

  Jailed New Delhi: भारतीय न्याय व्यवस्था की एक बहुत बड़ी विडंबना है कि वह जिसरूप में आज मौजूद है वह अंग्रेजों द्वारा खड़ी की गई थी । एक आम भारतीय के साथ न्याय करना इस व्यवस्था का ध्येय नहीं था । उसका मकसद तो ‘अपराधी’ मूल बाशिंदों को दंडित करना और भारत में रह रहे ब्रिटिश भद्र लोक के बीच के दीवानी मामले सुलटाना था। आज भी अगर यह सवाल किया जाए कि इस न्यायव्यवस्था से कितने प्रतिशत भारतीयों को न्याय मिलता है तो शायद उसका ईमानदार जवाब होगा 1% से भी कम ।

waiting इस देश की 20% से ज्यादा आबादी वकील करनेका माद्दा नहीं रखती- जो 78% प्रतिशत जनता(अर्जुन सेनगुप्ता कमेटीकी रपट के अनुसार) रोजाना 20 रुपये से कम में गुजारा करती है वो जाहिर है कि वकील करने में सक्षम नहीं होगी। जो खुद के वकील कर पाते हैं वो अंतिम फैसला आने तक सालों साल अदालतों के धक्के खाते रहते है। न्याय प्रक्रिया इतनी लम्बी, जटिल और महँगी होती है कि अंत आते-आते मुवक्किल आर्थिक और मानसिक रूप से निचुड़ चुका होता है। ऊपर से काफी संभावना रहती है कि आपका सामना भ्रष्ट, जातिवादी, मर्दवादी, साम्प्रदायिक, संभ्रांतवादी अथवा अक्षम जज से हो। इस प्रकार अततः जिन चंद लोगों को इस न्याय-व्यवस्था में न्याय मिलता है वो जनसँख्या के 1% से भी कम हैं । फिर भी आज तक सरकार या प्रभुत्वशाली वर्गों के द्वारा शोषित लोग थक-हार कर न्यायालयों का ही दरवाजा खटखटाते है, इस उम्मीद के साथ के साथ कि जज की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति निष्पक्षता के साथ उनसे न्याय करेगा । वह निष्पक्षता, जो संविधान में निहित है।
शक का दाग बचाती सरकार ; निष्पक्ष, संवेदनशील,प्रखर न्यायविद जज से मरहूम हो गयी

judge dattuवर्तमान सरकार जबसे सत्ता में आई है तब से लगातार जजों से जुड़े कई विवादित फैसले लेती रही है। सबसे पहला था जून महीने में सर्वोच्चन्यायलय के कॉलेजियम द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के लिए प्रस्तावित 4 नामों में से एक वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मणियम का नाम अलग कर उसे वापिस भेजना और फिर यह कदम और उसके पीछे के ‘कारण’ जगजाहिर करवा देना । नामवापसी को जाहिर करना बहुत ही शातिर कदम था । सरकार जानती थी कि नाम वापस करने के बाद भी यदि कॉलेजियम दोबारा वही नाम भेजे तो कानून उसे स्वीकार करने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं होता । लेकिन सार्वजनिक रूप से अपनी ईमानदारी पर शक का दाग लगने के बाद गोपाल सुब्रह्मनियम ने पद के लिए अपनी सहमति वापस ले ली । j. rm lodha ऐसे में प्रमुख न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम.लोधा द्वारा सार्वजनिक तौर पर सरकार के कदम की आलोचना करना और गोपाल सुब्रह्मणियम के समर्थन में आना किसी काम न आया। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय एक निष्पक्ष, संवेदनशील और प्रखर न्यायविद जज से मरहूम हो गया। दूसरा था अगस्त महीने में संविधान संशोधन करके और नया कानून ला कर उच्चतरन्यायपालिका की नियुक्ति की प्रक्रिया बदलना। इस पर हम इस लेख में विस्तारसे चर्चा करेंगे। और तीसरा था अभी हाल में सेवानिर्वित्त हुए प्रमुख न्यायाधीश एस. सदाशिवम को केरल का गवर्नर नियुक्त करना। न्यायिक स्वतंत्रता के संवैधानिक सिद्धांत के परखच्चे उड़ाता यह फैसला न्यायपालिका की गरिमा पर भी बट्टा लगाता है।
प्रिय जजों (सेवानिर्वित्त) को लालीपॉप देने का यथार्थ !

judgकई कानूनों में सेवानिवृत्त जजों को विभिन्न कमीशनों का अध्यक्ष या सदस्य बनाने का प्रावधान है और ज्यादातर सभी सरकारें अपने प्रिय जजों को यह लालीपॉप पकड़ाती हैं। लेकिन देश के पिछले प्रमुख न्यायाधीश को गवर्नर जैसी राजनैतिक पदवी देना तो बहुत ही गंभीर मसला है। न्यायमूर्ति सदाशिवम का यह कहना कि अगर वह गवर्नर नहीं बनते तो उन्हें किसानी करना पड़ता शोचनीय है। इसदेश में किसान की हालत इतनी कमजोर है कि सदाशिवम अपने जीवन भर की कमाईप्रतिष्ठा दाँव पर लगाने को तैयार हैं लेकिन किसानी करने को नहीं। काश किवे वापस अपने गाँव जा कर खेती करते तो हम भारतीय भी गर्व से दुनिया को कहसकते कि हमारा राष्ट्रपति भले ही उरुग्वे के राष्ट्रपति के जैसा सादा जीवन नजीता हो मगर हमारे देश का प्रमुख न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो कर गाँव मेंएक आम नागरिक की तरह जीवन यापन कर रहा है।यह तीनों फैसले न्यायिक स्वतंत्रता पर करारी चोट हैं, इमरजेंसी के युग कीयाद दिलाते हैं और केंद्र सरकार के बेशर्म और अधिनायकवादी रवैये के द्योतकहैं। इतिहास गवाह है कि तानाशाह हमेशा देश के संविधान और जजों को अपने वश में करना चाहता है।
न्यायिक नियुक्ति कमीशन बिल, 2014

कानून को लागू करने में इतनी जल्दीबाजी क्यों ?

judge governer पिछले महीने लोकसभा ने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति का यह बिल पारित कर दिया । अब इसका राज्यसभा द्वारा पारित होना और राष्ट्रपति की मुहर लगना बाकी है। माने तय है कि यह बिल कानून बन जाएगा। सरकार चाहती है कि मानसून सत्र में ही यह प्रक्रिया पूरी हो जाए। आखिर पूरे देश पर असर डालने वाले इस कानून को लागू करने में इतनी जल्दीबाजी क्यों ? सरकार ने न्यायपालिका को साफ़ इशारा कर दिया है कि हमारे द्वारा निर्धारित सीमा में रहोगे तो पदोन्नति के साथ साथ कार्यविधि के बाद भी मलाईदार पोस्टिंग मिल सकती है नहीं तो अब तुम्हारा केरियर हम चौपट कर सकते हैं ।

judge1993 के पहले इस देश में उच्चतर न्यायालयों में जजों की नियुक्ति कार्यपालिका के हाथ में होती थी। इसके कारण काफी सारी नियुक्तियाँ राजनीतिक कारणों से प्रेरित होती थीं। आपातकाल के दौरान हमें इसका सबसे वीभत्स रूप देखने को मिला। केशवानंद भारती केस को मनचाहा मोड़ देने के लिए इंदिरा गाँधी ने नियुक्तियाँ कीं। यह बात दीगर है कि अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने 7:6 के अनुपात से अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसमें संविधान के मूलभूत ढाँचे के सिद्धांतकी नींव पड़ी। इसी ढाँचे में निहित है न्यायिक स्वतंत्रता का सिद्धांत। बाद में हेबिअस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) केस में जब न्यायपालिका सरकार के सामने झुक गई तब एक निर्भीक और निष्पक्ष जज एच.आर. खन्ना, जिन्होंने अपना संवैधानिक दायित्वनहीं छोड़ा और विपक्ष में फैसला दिया, उन्हें प्रमुख न्यायाधीश बनने से हाथ धोना पड़ा, उनसे जूनियर जज को प्रमुख सर्वोच्च न्यायाधीश बनाया गया और इसके विरोधस्वरूप उन्होंने इस्तीफा दे दिया ।1993 में सर्वोच्च न्यायाधीश ने अपने फैसले से इस नियुक्ति प्रक्रिया में आमूलचूलबदलाव ला दिया ।

SUPREME_COURTअब सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह से सर्वोच्च न्यायलय के 5 सबसे वरिष्ठ जजों यानी कॉलेजियम के हाथ में आ गयी। सरकार एक बार कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित नाम वापस भेज सकती है लेकिन उसके बाद अगर दोबारा कॉलेजियम वही नाम भेजे तो राष्ट्रपति को उस पर मुहर लगानी ही पड़ती है। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता का पूरा अभाव है । जजों के बेटों-भतीजों की नियुक्तियाँ बेतहाशा होती हैं। न्यायपालिका संभ्रांत वर्ग के पुरुषों का क्लब बन के रह गई है जिसमें औरतों, दलितों और आदिवासियों का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है। सरकारी मनमानी से बचने के लिए बनी यह व्यवस्था पूरी तरह से विफल हो गई है। न्यायाधीश नियुक्ति का नया कानून इन दोनों उपरोक्त प्रणालियों की बुराइयाँ लिए हुए है।  संविधान को संशोधित कर एक न्यायाधीश नियुक्ति कमीशन बनाया गया है, जो उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और प्रमुख न्यायाधीश की नियुक्ति करेगा। इस कमीशन में 6 सदस्य होंगे जिनमें 3 सर्वोच्च न्यायलय के तीन सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश, कानून मंत्री और 2 गणमान्य हस्तियाँ होंगी (देश के प्रमुख न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और सबसे बड़े विपक्षी दल के नेताद्वारा मनोनीत किये गए)।

 … तो न्यायपालिका पूरी तरह सरकार के कब्जे में होती !

manmohan p. chidambarmकिसी भी जज को प्रस्तावित करने के लिए 6 में से 5 सदस्यों की सहमति आवश्यक होगी। अगर किन्हीं 2 सदस्यों ने विरोध में मत दिया तो प्रस्ताव वहीँ रद्द हो जाएगा। इस प्रकार यदि कानून मंत्री ने यदि एक सदस्य को भी अपने पक्ष में मना लिया तो सरकार की नापसंदगी वाला उम्मीदवार जज नहीं बन पाएगा। इससे भी घातक प्राविधान था सर्वसम्मति का। उसके अनुसार अगर एकबार राष्ट्रपति कोई प्रस्तावित नाम वापस भेज देते हैं तो कमीशन सर्वसम्मति से ही उस नाम को पारित कर पाएगा। इस प्रकार कानून मंत्री को वीटो की शक्ति मिल गयी थी। ऐसा होता वो दिन दूर नहीं था जब न्यायपालिका पूरी तरह सरकार के कब्जे में होती। खैर, विपक्षी दलों ने काफी विरोध कर यह प्रावधान हटवा लिया। वैसे अगर यह प्रावधान बना रहता और कोर्ट के सामने आता तो अवश्य ही गैर संवैधानिक घोषित होता। लेकिन कानून मंत्री की कमीशन में मौजूदगी ही न्यायपालिका और कार्यपालिका की अलग-अलग सत्ताओं के सिद्धांत की अवमानना है। मनमोहन सिंह सरकार द्वारा 2010 में लाए गए बिल में भी कमीशन में कानून मंत्री को रखने का प्रावधान था।
गैरपारदर्शी प्रणाली में न्यायपालिका के साथ सरकार भी ! स्तर में गिरावट तंय

judicial-appointments1कॉलेजियम प्रणाली की सबसे बड़ी खामी गैरपारदर्शिता इस कानून में बरकरार है, बस उस गैरपारदर्शी प्रणाली में न्यायपालिका के साथ-साथ सरकार को भी घुसा दिया गया । किसी भी न्यायिक कमीशन में वर्तमान जज और कानून मंत्री नहीं रहने चाहिए। एक और महत्वपूर्ण पहलू है कमीशन के पास समय की कमी। कमीशन को 30 सर्वोच्च न्यायालय के जजों, 1 भारत के प्रमुख न्यायाधीश और 906 उच्च न्यायालय के जज और प्रमुखन्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानान्तरण करने का दायित्व और अधिकार होगा। हमारी न्याय-व्यवस्था पहले से ही रिक्त पदों की समस्या से त्रस्त और ग्रस्त है। उच्चन्यायालयों में करीब 300 पद रिक्त पड़े हैं। नियुक्ति कमीशन को हर साल करीब 1000 अभ्यार्थियों में से करीब 100 जज नियुक्त करने होंगे। ऐसे में इन नियुक्तियों को विश्वसनीय बनाने के लिए ज़रूरी है कि यह कमीशन पूर्णकालिक हो। फिलहाल जो सदस्य इस कानून में हैं उन सभी के पास अपने ही इतने काम हैं कि पूरी सम्भावना है कि रिक्त पदों की समस्या वहीँ की वहीँ रह जाएगी या फिरजल्दबाजी में नियुक्त हुए जजों से न्यायपालिका के स्तर में और भी गिरावट आएगी।
जजों की न्युक्ति में एक पूर्णकालिक कमीशन की ज़रूरत

judge se uparकैंपेन फॉर ज्यूडिसियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफ़ोर्म्स नामक समूह जो कई वर्षों से न्याय व्यवस्था में जवाबदेही और मूलभूत सुधारों की माँग उठाता आया है, ने काफी पहले से एक ऐसे पूर्णकालिक कमीशन की माँग रखी है जो जजों कीनियुक्ति करेगा और उनके खिलाफ शिकायतें सुनेगा। जजों की बर्खास्तगी(जो फिलहाल बहुत जटिल है) भी उसके हाथ में होगी।कमीशन की नियुक्ति सी.ए.जी., सी.वी.सी., मुख्य चुनाव आयुक्त सर्वोच्च न्यायालय के 2 वरिष्ठ जज, प्रधान मंत्री और नेता विपक्षी दल की 7 सदस्यीय टीम करेगी। इंग्लैंड, फ्रांस, और न्यूयॉर्क के न्यायिक कमीशनों की तर्ज पर इस कमीशन में भी कम से कम 3 ऐसे जाने-मानेईमानदार व्यक्ति हों जो न्याय व्यवस्था से ताल्लुक न रखते हों। मेरा मानना है कि अगर प्रक्रिया को इतना जटिल न भी किया जाय तो भी भारत के प्रमुख न्यायाधीश, प्रधान मंत्री और सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता- इन तीन सदस्यों टीम द्वारा चुने गए एक पूर्णकालिक कमीशन की ज़रूरत है, जिसमें वर्तमान जज या कानून मंत्री न हों।

Supreme-Court-of-Indiaयह कमीशन कोई भी पद खाली होने पर सार्वजनिक घोषणा करे और अभ्यर्थियों की सूची भी घोषित करे। जनता को यह मौका मिले कि वह अभ्यार्थियों के बारे में अपनी आपत्तियाँ दर्ज कर सके जिनको परख कर कमीशन नियुक्तियाँ करे।इसके अलावा नियुक्तियों के ठोस और सार्वजनिक पैमाने होने चाहिए। वर्तमान कानून ने न्यायिक कमीशन को यह अधिकार दिया गया है कि वह यह पैमाने निर्धारित करे। कानून की समझ, समय के साथ बदलते कानूनों की जानकारी और ईमानदारी केसाथ यह भी बहुत ज़रूरी है कि न्यायाधीश बनने के अभ्यार्थी कमजोर और हाशिये परखड़े समुदायों के प्रति संवेदनशील हों, समय के साथ बदलते सामाजिक मूल्योंके प्रति संवेदनशील हों मेहनती हों और धैर्यवान भी। कमीशन सुनिश्चित करेकि न्यायालयों में महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और विकलांगव्यक्तियों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व हो।इसके अलावा उच्चतर न्यायालयों के जजों की बर्खास्तगी की प्रक्रिया भी बहुत जटिल है और उसमें भी आमूल-चूल बदलाव की ज़रूरत है। (सामयिक वार्ता )

   प्योली स्वातिजा

          New Delhi