सावधान , खेतों से  उग रहा भयावह खौफ और मौत का सन्नाटा !

         मध्य प्रदेश में कैंसर मरीज 93 हजार 754 (आंकड़ों में)!

Bhopal :  ”डग-डग रोटी, पग-पग नीर” और अपने स्वच्छ पर्यावरण के लिये पहचाना जाने वाला मध्य प्रदेश का मालवा इलाका इन दिनों त्रासदी के खौफनाक कहर से बेजार है। यहाँ गाँव-गाँव में कैंसर की जानलेवा बीमारी इन दिनों किसी महामारी की तरह पाॅव पसार रही है। कहीं तो गाँवों में घर-घर इसका आतंक है। कहते हैं कि तम्बाकू और बीड़ी पीने वालों को यह बीमारी जल्दी हो जाती है पर वे भी इस बीमारी के चंगुल से नहीं बचे जों कभी इसका इस्तेमाल भी नहीं किये।

मतलबी मीडिया से दूर है जनहित का मुद्दा !

चिकित्सक व विशेषज्ञों की राय में इसका सबसे प्रमुख कारण है खेतों में प्रयुक्त होने वाला कीटनाशक। खबरों में है कि एक समय पंजाब में भी इसी तरह के हालात बन गये थे। हालत ये हो गई थी कि कैंसर मरीजों को लाने-ले जाने वाली रेलगाड़ी को कैंसर ट्रेन कहा जाने लगा था। अब वही हाल मालवा की हो गया है। बड़ी बात यह है कि प्रभावितों की बड़ी तादाद होने के बाद भी यह मुद्दा अब तक मीडिया की हेडलाइन से दूर है।

एक ही गाॅव में 15 गुजर गये 35 मरीज कैंसर के ईलाज में !

इन्दौर से करीब 15 किमी दूर घने जंगलों और हरे-भरे खेतों के रास्ते हम पहुँचे हरसोला गाँव में। करीब नौ हजार की आबादी और अठारह सौ घरों वाला यह गाँव आलू और सब्जियों के उत्पादन के कारण पहचाना जाता है। यहाँ के कम स्टार्च वाले आलू विदेशों सहित देश भर में बनने वाली वेफर्स में उपयोग किया जाता है। सरपंच लक्ष्मीबाई मालवीय बताती हैं- यहाँ कैंसर के 35 मरीज थे, जिनमें से 15 की मौत हो चुकी है। इसी महीने इस बीमारी से हजारीलाल और रमेश पिता हरिराम मोडरिया की मौत हुई है। इगाँव के लोग बताते हैं कि करीब पाँच साल पहले यहाँ कैंसर ने दस्तक दी। 2017-18 में ही अब तक 11 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। इनमें रामकिशन चैधरी, रामचन्द्र पटेल, किशनलाल वर्मा, रमेश बारोड, लक्ष्मीनारायण सोलंकी, भागवंती बाई, कौशल्या बाई, रामकन्या बाई आदि हैं। इससे पहले 2016 में भी लीलाबाई, मदनलाल मुकाती, रामचन्द्र राव, लक्ष्मीबाई मुकाती, परमानन्द माली तथा बद्रीलाल डिंगू की मौत कैंसर से हो चुकी है।

6400 लोगों की जाँच में 25 कैंसर !

यहाँ जब बीते महीने डॉक्टरों ने पड़ताल की तो पहले ही दिन 6400 लोगों की जाँच में 25 कैंसर के मरीज मिले। यह आँकड़ा देखकर डॉक्टर भी चैंक गए। इंदौर कैंसर फाउन्डेशन  के डॉ. दिगपाल धारकर ने बताया, अमूमन एक लाख लोगों में से 106.6 कैंसर के मरीज होते हैं। यहाँ तो इस अनुपात से बहुत ज्यादा हैं। मेरे अनुमान से करीब पाँच गुना ज्यादा और यह शोध का विषय है। डॉ. हेमंत मित्तल और विकास गुप्ता के मुताबिक इस गाँव में सभी तरह के मुँह, गले, स्तन, गर्भाशय, रक्त तथा लीवर कैंसर के रोगी शामिल हैं। जबकि पूरे गाँव में महज 127 लोग गुटखा-तम्बाखू खाते हैं और 95 धूम्रपान करते हैं।

कीटनाशक ले रहा किसानों की जाॅन !

लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने गाँव में पीने के पानी के स्रोतों 6 बोरिंग सहित तालाब के पानी की भी जाँच की है। हालांकि अब तक पानी के परीक्षण की रिपोर्ट नहीं आई है लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि डेढ़ साल पहले भी जब जाँच हुई थी तो इसमें कैल्शियम की मात्रा ज्यादा पाई गई थी। पर्यावरण के जानकार बताते हैं कि अधिक-से-अधिक उत्पादन की होड़ में गाँव के आसपास खेतों में इतनी बड़ी तादाद में कीटनाशकों का इस्तेमाल किया गया है कि यहाँ की धरती और पानी दोनों ही जहरीले हो चुके हैं। खेतों का कीटनाशक बारिश के पानी के साथ जमीन में उतरता है और जमीन के साथ जमीनी पानी के भण्डार को भी प्रदूषित करता है। यह साफ है कि वर्ष 2012 में पहली बार यहाँ कैंसर के चार मरीज मिले थे। लेकिन इलाज के अभाव में इन चारों की बारी-बारी से मौत हो गई। इलाके में कैंसर के कई मरीज अब भी हैं लेकिन इनमें ज्यादातर झाड़-फूँक के अन्धविश्वास में अस्पताल पहुँचते इतनी देर कर देते हैं कि उनकी मौत से बचना नामुमकिन हो जाता है। बीते छह महीनों में ही चार लोगों की मौतें हो चुकी हैं। ग्रामीण रूपसिंह बताते हैं- कैंसर मरीजों में बुजुर्ग ही नहीं महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं। इनमें अधिकांश कोई नशा नहीं करते थे।

राजधानी भेपाल से 100किमी दूर स्थित गाॅव में हर 10वाॅ ब्यक्ति कैंसर पीड़ित!

हरसोला गाँव के ज्यादातर लोग किसान हैं और अपने खेतों में काम करते हैं। सभी मृतक किसी-न-किसी रूप में किसान ही हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि गाँव में बीते 40 सालों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल करीब चार से पाँच गुना तक बढ़ा है। इसी ने हमारे परिवेश में जहर और हवा में कड़वाहट घोल दी है। ये बीमारियाँ इन्हीं की देन हैं। कमोबेश यही स्थिति शाजापुर जिले के अमलाय पत्थर गाँव की है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब सौ किमी दूर करीब पौने दो हजार की आबादी और सवा तीन सौ परिवार वाले इस गाँव के हर दसवें घर में कैंसर के मरीज अपनी मौत का इन्तजार करते मिले। अब तक कैंसर से इस गाँव में 31 मौतें हो चुकी हैं।अलग-अलग तरह के कैंसर से पीड़ित लोगों के लिये आसपास के अस्पतालों में इलाज के लिये सुविधाएँ भी नहीं हैं तथा इंदौर या भोपाल के कैंसर अस्पतालों में लम्बे समय तक रहकर इलाज करा पाना उनके बस में नहीं है। यही वजह है कि कैंसर होने पर सिवाय मौत के इन्तजार के अलावा इनके पास कोई चारा नहीं है। यहाँ कैंसर का खौफ इस तरह है कि लोग यहाँ के कुँआरे लड़कों के लिये अपनी लड़कियों का हाथ देने तक में कतराते हैं। गाँव का नाम सामने आते ही वे मुँह बिदका लेते हैं। अमलाय में 18 से 40 साल के करीब 60 युवक ऐसे हैं, जो अपनी शादी के इन्तजार में बुढ़ापे की तरफ बढ़ते जा रहे हैं।

धुम्रपान व गुटखा ले रहा जाॅन !

नवम्बर 2012 में गाँव के सभी 13 जलस्रोतों की जाँच की गई थी लेकिन इसकी रिपोर्ट अब तक ग्रामीणों को नहीं बताई गई है। जवाहर कैंसर हॉस्पिटल भोपाल के शोध विशेषज्ञ डॉ. गणेश ने बताया कि गाँव के पानी, जमीन, खाद और कीटनाशकों के उपयोग की स्थिति, धूम्रपान, गुटखा तम्बाखू की लत, जीवनशैली, खानपान के तौर तरीकों सहित कई आयामों से शोध के बाद ही अमलाय में इतनी बड़ी तादाद में हो रही बीमारी के कारणों का खुलासा हो सकता है लेकिन हाँ खेतों में कीटनाशकों का अन्धाधुन्ध उपयोग इसे बढ़ा सकता है। गाँवों में यही बड़ा कारण हो सकता है। जिले के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जीएल सोढी का कहना है कि गाँव के लोग कैंसर के प्रति गम्भीर नहीं हैं।

उज्जैन में सर्वाधिक 2787 दर्ज मरीजों में 30 फीसदी स्तन कैंसर पीड़ित महिलाएँ !

इंदौर सम्भाग की क्षेत्रीय संचालक डॉ. लक्ष्मी बघेल भी मानती हैं कि डेहरी और उसके आसपास कैंसर का बढ़ता प्रकोप शोध का विषय है। फिलहाल हमने इन सभी गाँवों में शिविर लगाकर रोगियों को चिन्हित करने की पहल शुरू कर दी है। धार के ही पड़ोसी जिले खंडवा में बीते एक साल में कैंसर से 31 मौतें हो चुकी हैं। इस साल यहाँ 283 नए कैंसर रोगी दर्ज हुए हैं। झाबुआ जिले के गाँवों में भी यही स्थिति है। बीते तीन साल में यहाँ करीब 30 मरीजों की मौत हुई है तथा 240 से ज्यादा नए मरीज दर्ज हुए हैं। अलीराजपुर में 223 दर्ज हैं। रतलाम में 172 कैंसर पीड़ित हैं। खरगोन में चैंकाने वाला आँकड़ा सामने आया है, जहाँ कुल 290 मरीजों में 62 फीसदी महिलाएँ शामिल हैं। देवास में बीते चार सालों में 934 मरीज दर्ज हैं। मंदसौर में तीन सालों में कैंसर पीड़ितों का आँकड़ा 33 से बढ़कर 209 तक पहुँच गया है। उज्जैन में सर्वाधिक 2787 मरीज दर्ज हैं, इनमें 30 फीसदी स्तन कैंसर पीड़ित महिलाएँ हैं। उज्जैन का कैंसर अस्पताल इलाके में मँडल के रूप में माना जाता है।
जिला सरकारी अस्पताल में दर्ज कैंसर के रोगी                                                    कैंसर से हुई मौतें
                 खंडवा                                                                                     283 (बीते 1 साल में) 31
                 झाबुआ                                                                                     240 (बीते 3 साल में) 30
               अलीराजपुर                                                                                223 (बीते 1 साल में) आँकड़े अप्राप्त
               रतलाम                                                                                       172 (बीते 1 साल में) आँकड़े अप्राप्त
              खरगोन                                                                                        290 (बीते 2 साल में) आँकड़े अप्राप्त
               देवास                                                                                          934 (बीते 4 साल में) आँकड़े अप्राप्त
            मंदसौर                                                                                           209 (बीते 3 साल में) आँकड़े अप्राप्त
           उज्जैन                                                                                             2787 (बीते 4 साल में) आँकड़े अप्राप्त
           धार                                                                                                    आँकड़े अप्राप्त आँकड़े अप्राप्त
        शाजापुर                                                                                                     आँकड़े अप्राप्त आँकड़े अप्राप्त
        बड़वानी                                                                                                       800 (बीते 3 साल में) आँकड़े अप्राप्त
         नीमच                                                                                                             आंकडें अप्राप्त
                                       (सरकारी जिला अस्पतालों से मिले रिकॉर्ड के मुताबिक)

आंकडों से कहीं जादा है बीमारों की तांदाद !
ये आँकड़े केवल जिले के सरकारी अस्पतालों में पहुँचने वाले मरीजों के हैं। लेकिन अधिकांश मरीज कैंसर के इलाज के लिये जिला अस्पतालों की जगह समीप के इंदौर, भोपाल, अहमदाबाद, मुम्बई और बड़ौदा के अस्पतालों की तरफ जाते हैं। इनका कोई रिकार्ड कहीं नहीं है। एक बड़े अनुमान के मुताबिक अकेले मालवा में सात हजार से ज्यादा मरीज हैं। कैंसर का आँकड़ा बड़ी तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह चिन्ता का विषय है।

बुझी उम्मीदों को जिन्दा करने की कोशिश करती कैंसर ट्रेन ?

कुछ सालों पहले से पंजाब के बठिंडा से बीकानेर जाने वाली ट्रेन को कैंसर ट्रेन के नाम से ही पहचाना जाता है। इससे हर दिन 200 से ज्यादा कैंसर रोगी बीकानेर के कैंसर अस्पताल पहुँचते हैं। यह सिलसिला सालों से अनवरत चल रहा है। 20 स्टेशनों से गुजरते हुए यह हर दिन 325 किमी का सफर तय कर कैंसर मरीजों की बुझी हुई उम्मीदों को जिन्दा करने की कोशिश करती रही है।

रसायनों का खेंतों में अंधाधुंध प्रयोग नें खरीदी मुसीबत !

हरित क्रान्ति के बाद पंजाब में उत्पादन बढ़ाने के नाम पर कीटनाशकों तथा रासायनिक खादों का अन्धाधुन्ध इस्तेमाल हुआ और इस ट्रेन में सफर करने वाले मरीजों का कारण भी यही है। यहाँ के प्रदूषित पानी, हवा और जमीन ने इन्हें कैंसर की बीमारी तोहफे में दी है। मध्य प्रदेश के मालवा का एक बड़ा हिस्सा भी अब इसी तर्ज पर कैंसर की अनिवार्य परिणिति को भुगतने को मजबूर है। अकेले मध्य प्रदेश में कैंसर मरीजों का ताजा आँकड़ा तेजी से बढ़कर 93 हजार 754 तक पहुँच चुका है।
फेडरेशन ऑफ गायनिक सोसायटी इण्डिया की अध्यक्ष डॉ राजदीप मल्होत्रा ने बताया- पहले प्रायः 45 वर्ष या इससे अधिक उम्र की महिलाओं में ही स्तन कैंसर की आशंका होती थी लेकिन अब 25 से 35 साल की महिलाओं में यह बीमारी अधिक देखने में आ रही है। भारत में हर आठ में से एक महिला को स्तन कैंसर की आशंका रहती है। स्तन कैंसर साइलेंट किलर है तथा थोड़ी-सी भी देरी से डाइग्नोस होता है तो इसके ठीक होने की सम्भावना कम हो जाती है। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्र में इससे मौतें ज्यादा होती हैं, क्योंकि वहाँ तक जाँच व निदान की तकनीक और संसाधन अब तक नहीं पहुँच सके हैं। इसका सबसे बड़ा कारण आधुनिक जीवनशैली, नशा और अनुवांशिकी के साथ सब्जियों और अनाज में कीटनाशकों के अंश का पहुँचना है।
सर्वाधिक यूरिया खपत वाले प्रदेशों में उत्तर प्रदेश प्रथम, मध्य प्रदेश तीसरे नम्बर पर!

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2015 से मार्च 2016 के बीच एक साल में 23 लाख 87 हजार 499 मीट्रिक टन यूरिया की प्रदेश के खेतों में खपत हुई है। पहले नम्बर पर उत्तर प्रदेश है, जो क्षेत्रफल की दृष्टि से काफी बड़ा है। छत्तीसगढ़ का क्षेत्रफल काफी कम होने के बावजूद यहाँ भी यूरिया की खपत 8 लाख 45 हजार 057 मीट्रिक टन हुई है। इसमें हर साल 20 फीसदी की दर से बढ़ोत्तरी हो रही है। जाहिर है कि मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में किसान यूरिया का बेतहाशा उपयोग कर रहे हैं। हरित क्रान्ति के दौर में उत्पादन बढ़ाने के लिये किसानों को परम्परागत खेती छोड़कर रासायनिक खादों के लिये सरकारों ने प्रेरित किया। किसान उपज के मान से मालामाल हुए भी। लेकिन तब इसके दूरगामी दुष्परिणामों पर गौर नहीं किया गया।
अपनाना होगा परम्परागत खेती का तरीका !
हमारे यहाँ जैविक खेती की अवधारणा नई नहीं है, परम्परा से हमारे पूर्वज इसे करते रहे हैं। खेती की आसन्न चुनौतियों से निपटने का एकमात्र विकल्प है-अपनी जड़ों की ओर लौटना। हमें फिर परम्परागत खेती के तरीकों पर आना होगा। अब किसानों को भी यकीन होता जा रहा है कि खेती में रसायनों का उपयोग बहुत हुआ। अब इसे रोकने का समय आ गया है। यह जमीन और स्वास्थ्य दोनों के लिये हानिकारक है और पैसों की बर्बादी भी है।दुर्भाग्य से जिन गाँवों के कोठार कभी अन्न के दानों से भरे रहते थे, आज वहाँ दवाइयाँ हैं, जहाँ के खेत सोना उगलते थे, आज वहाँ मौतें हो रही हैं। हवाओं में दुर्गन्ध का कसैलापन है। जहाँ कभी फसलें आने पर लोक गीत गूँजते थे, आज वहाँ भयावह खौफ और मौत का सन्नाटा है। जहाँ के लोग हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी हृष्ट-पुष्ट बने रहते थे, आज वे कंकाल की तरह नजर आते हैं और निराशा इतनी कि हर दिन अपनी मौत की घड़ियाँ गिनते रहते हैं।

जानलेवा कैंसर के ईलाज पर करोड़ो खर्च का दावा करने वाली सरकारे कब ढूंढेगी कारण व निस्तारण !
बीते तीस-चालीस सालों में हमने खेती की उपज बढ़ाने के नाम पर किन यमदूतों को हमारी खेती में शामिल कर लिया कि हमारी जान पर ही बन आई। भला ऐसी समृद्धि किस काम की जो मौत का तोहफा देती हो। कीड़ों को मारने वाली दवा जब हमारी खुद की सेहत पर भारी पड़ जाये तो सवाल खड़े होना लाजमी है कि आखिर कब हम इस जहर से मुक्त होंगे। जानलेवा कैंसर के इलाज के नाम पर करोड़ों खर्च करने वाली सरकारें इन कीटनाशकों, खाद और गुटखा-तम्बाखू उत्पादों के बनाने और बिक्री पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाती। किसान तो मजबूरी में अपनी जीती जागती फसलों को बचाने के लिये इसका प्रयोग करते हैं लेकिन सरकारों की आखिर क्या मजबूरी हो सकती है। आखिर कब तक हम अपने अन्नदाता किसानों को कैंसर के दलदल में धकेलते रहेंगे। कब तक…?

 

साभार :  Manish Vaidya (India Wter Portel)