सिसकता चमड़ा उद्योग !

नोटबंदी की मार फिर स्लॉटर हाउसों पर मंदी !

Kanpur : कानपुर कभी अपने चमड़ा उद्योग और जूतों के लिए मशहूर हुआ करता था। आज उन कारखानों में बंदी की आहट सुनायी पड़ रही है। पहले नोटबंदी की मार फिर स्लॉटर हाउसों पर मंदी का असर और अब मवेशियों के लिए एक नया कानून, कुल मिला कर कानपुर का चमड़ा उद्योग धीरे धीरे खत्म हो रहा हैं। कुछ साल पहले तक कानपुर में विदेशी खरीददारों की आमद होती रही है। रेड टेप, बाटा, हश ,पप्पिज, गुच्ची, लुइस जैसे लगभग हर बड़े ब्रांड को चमड़े की सप्लाई कानपुर से होती थी, आज फैक्ट्रियों में सिर्फ 15-20 दिन का स्टॉक बचा है। आगे क्या होगा कहना कठिन है।
चमड़ा उद्योग एक नजर में !
चमड़े के कारोबार में कानपुर शहर का समृद्ध इतिहास है। जब देश आजाद हुआ तो 1947 में 7 टैनरीज थे। कानपुर शहर के पेच बाग, नयी सड़क इलाके में उत्तर-प्रदेश की सबसे बड़ी चमड़ा मंडी है। 2014 से पहले तक यहां रोज 20-25 ट्रक जानवर की खाल आती थी। 500 रजिस्टर्ड कारोबारियों के बीच लगभग 1200 मजदूर यहाॅ काम करते थे। एक ट्रक जानवर की खाल का दाम 15 से 16लाख तक होता था। पेच बाग में खाल को नमक लगा कर रखे जाने का तरीका था। फिर टेनरी कारखाना भेजकर वहां उसको साफ करके फैक्ट्री में भेजा जाता रहा है। जिससे जूते, घोड़े की काठी, बेल्ट, पर्स और अन्य आइटम बनते थे। यहाॅ यह ब्यवसाय लगभग 6000 करोड़ का टर्नओवर देता है। चमड़ा उद्योग में भारत में तमिलनाडु के बाद कानपुर दूसरे नंबर पर है। सीधे तौर पर 2 लाख और अप्रत्यक्ष रूप में 20 लाख लोगों को इस ब्यवसाय से रोजगार मिलता है।
वर्तमान स्थिति !
मौजूदा समय में कुल 300 ट्रेडर्स बचे हैं। गौ रक्षक आन्दोलन तथा अन्य राजनीतिक कारणों खाल भी अब 2-4 ट्रक एक हफ्ते में आती है। नतीजा ये हुआ है कि बहुत से ट्रेडर्स ने अपना धंधा छोड़ कर रेडीमेड कपडे की दुकान खोल ली है। पेच बाग में चमड़े का व्यापार करने वाले मोहम्मद हाफिज के अनुसार खाल रखा जाने वाला आधा अहाता बंद हो गया है। 1888 से व्यापार करते आ रहे हैं लेकिन अब बहुत मुश्किल है। याद करके बताते हैं कि पहले कानपुर में खाल केरल और मेघालय जैसे दूर दराज इलाकों से भी आया करती थी।
उत्तर प्रदेश लेदर इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के महासचिव इफ्तिखारुल अमीन के अनुसार चमड़ा उद्योग बहुत कठिन दौर से गुजर रहा है। वे कहते हैं, देखिये जब माल आएगा नहीं तो टेनरी बंद हो जाएगी। आगे काम कैसे होगा खाल कहीं से मिल नहीं रही है। उनकी आवक मंडी में कम हो गयी है। बहुत चला पाए तो 2-3 महीने बस,व्यापारियों के अनुसार चमड़ा कारोबार की पूरी चेन डिस्टर्ब हो गयी है। पहले किसान अपने मवेशी (भैंस) को कस्बे की बाजार में बेच देता था। अमीन का कहना है कि दूध न के बराबर देने वाली एक स्पेंट भैंस लगभग 20000-30000 में मिल जाती थी और स्लॉटर हाउस भेजी जाती थी। वहां से खाल मार्किट में आ जाती थी जो टेनरी में प्रोसेस होकर फिर फैक्ट्री में गुड्स बनाने के काम आती थी।
ऐसा क्यों हुआ ?
कारोबार में गिरावट की वजह गाय को लेकर पिछले वर्षों में हुआ हंगामा है। इन हंगामों के बाद अब पशुओ का आवागमन बहुत कम हो गया है।स्लॉटर हाउस को जानवर मिल नहीं पा रहे है। नतीजा फैक्ट्री को कच्चा माल कम हो गया। अब इधर नियम बना दिया गया कि किसान अपनी भैंस स्लॉटर हाउस में मारे जाने के लिए नहीं बेचेगा। चमड़ा कारोबारी किसान के घर-घर जा कर मवेशी खरीदने को तैयार नहीं क्योंकि पशुओ का यातायात गौरक्षकों के हमलों के कारण मुश्किल हो गया हैं। धीरे-धीरे पूरी चेन पर रोक लग सकती है। मौजूदा समय में ही बिजनेस में 40 फीसदी की कमी आ चुकी है। विदेशी ग्राहक अब कानपुर की तरफ रुख करने से हिचकिचा रहे हैं। अमीन के अनुसार अब विदेशी ग्राहक सीधे कह देते हैं कि आर्डर पूरा हो पायेगा समय से कि पाकिस्तान, बांग्लादेश से करवा लें। विदेशी ऑर्डर्स में समय पर डिलीवरी का बहुत महत्त्व रहता हैं, लेकिन अब ऐसा संभव नहीं रह गया है।
बंदी के कगार पर छोटी टेनरी !
छोटी टेनरी तो बंदी के कगार पर पहुंच गयी है। आशंका है कि बड़े ग्रुप सीधे र्फनिस्ड चमड़ा रूस, अफ्रीका और अमेरिका से आयात कर लेंगे, लेकिन घरेलू बाजार बिगड़ने से हजारों मजदूर बेरोजगार हो जायेंगे। पशुओं के हाट नहीं लगेंगे। किसानों की आय, जिसे लगभग 60 प्रतिशत टर्नओवर का पेमेंट होता हैं वो अब कम हो जायेगी।

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