157 साल पुराना प्रावधान खत्म,समलैंगिकों को मिली सामाजिक स्वीकार्यता !

समलैंगिकता के विरुद्ध बोलनेवाले बयानवीरों ने साधी चुप्पी !
New Delhi : सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों के संवैधानिक पीठ ने पिछले गुरुवार , समलैंगिक संबंधों को कानूनी दर्जा दे दिया। इसे लेकर अत्यधिक उत्साहित होने वालों को थोड़ा ठहरकर हकीकत का इंतजार करना चाहिए। भारतीय दंड संहिता के इस 157 वर्ष पुराने प्रावधान को खत्म करना समलैंगिक समुदाय के लिए व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता और मजबूत कानूनी संरक्षण हासिल करने की दिशा में पहला लेकिन छोटा कदम है। हमने बार-बार देखा है कि हमारे देश में कानूनी पहल से सामाजिक सुधारों को सामाजिक मान्यता प्रायः नहीं मिलती है। ध्यान रहे कि अतीत में कई प्रमुख राजनेता खुलकर समलैंगिकता के विरुद्ध बोल चुके है।

समलैंगिक विवाह को वैवाहिक कानूनों में मान्यता ?
समलैंगिक अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को सबसे पहले आगे की चुनौती को समझना होगा। यह बहस दशकों पुरानी है। इस कवायद में पुलिस को शिक्षित करना भी शामिल है जो समलैंगिक जोड़ों को दंडित करने के लिए कुख्यात रही है। दूसरी तात्कालिक जरूरत होगी विवाह कानूनों में संशोधन करके समलैंगिक विवाह को उनमें स्थान देना। यहां यह याद रखना होगा कि अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने महज तीन वर्ष पहले अपने ऐतिहासिक निर्णय के जरिये ऐसे विवाहों को कानूनी मान्यता प्रदान की। जबकि यह मामला अमेरिका में एक दशक से अधिक समय से सरगर्म था। भारतीय अदालतों ने मूलभूत मानवाधिकारों की रक्षा में कोई खास तेजी नहीं दिखाई है। ऐसा लगता नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भी वे समलैंगिक अधिकारों के प्रवर्तन में कोई तेजी दिखाएंगी।

नेता इस मुद्दे से बचनें की कोशिश में !
ध्यान रहे कि प्रधानमंत्री तो छोडिए किसी भी बड़े राजनेता ने सार्वजनिक रूप से इस विषय पर जुबान नहीं खोली है। उनको भय है कि ऐसा करने से समाज का रूढि़वादी तबका नाराज हो जाएगा। यह वही तबका है जिसने दो दशक पहले दीपा मेहता की फिल्म फायर का विरोध किया था। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि सत्ताधारी दल के किसी राजनेता ने गुरुवार के निर्णय पर कोई टिप्पणी नहीं की है। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस अंतिम याचिका पर आया है और इसने सर्वोच्च न्यायालय के 2013 के निर्णय को पलट दिया है। 2013 के निर्णय में दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 के निर्णय को पलटा गया था। गुरुवार के निर्णय का महत्त्व केवल समलैंगिकता को अपराध न मानने से कहीं परे है। पीठ ने जो कहा है उसे व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। पहली बात तो यह कि समलैंगिकता को एक प्राकृतिक जीवविज्ञान संबंधी अवधारणा के रूप में देखना होगा, न कि मानसिक विकृति के रूप में। समलैंगिक को अल्पसंख्यक के रूप में देखने की भी जरूरत नहीं है जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय में कहा गया था।
समलैंगिकों से भेदभाव नहीं !
अदालत ने कहा कि इसके आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। यानी उनके मूल अधिकार अक्षुण्ण हैं। उसने व्यक्तिगत चयन और निजता के अधिकार पर जोर दिया है। हमारी हालिया राजनीतिक बहस में इन दोनों का ह्रास हुआ है। यह निर्णय देश के कारोबारी जगत के लिए भी अवसर है कि वह कुछ प्रगतिशीलता दिखाए। वर्ष 2015 में करीब 379 अमेरिकी कंपनियां और पेशेवर संगठन (गूगल, ऐपल, गोल्डमैन सैक्स, मॉर्गन स्टैनली और वॉलमार्ट समेत) अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय में समलैंगिक विवाह की सुनवाई के वक्त अदालती मित्र बने थे। उनका कहना था कि चूंकि वे समलैंगिक दंपतियों को लाभ नहीं पहुंचा सकते थे इसलिए तमाम प्रतिभाशाली लोग नौकरी से बाहर रह गए। भारतीय कंपनियों में असहिष्णुता का माहौल भी समलैंगिकों को सामने आने या रोजगार मांगने से रोकता है।भारतीय उद्यमी जगत सामाजिक सुधारों में शायद ही कभी रुचि दिखाता है। ऐसे में यह शुरुआत का अच्छा वक्त है।

                                                                                                                                                                                                                                      Vaidambh Media